दुनिया से व्यापार होगा, लेकिन दबाव में नहीं: मोहन भागवत

भारत–अमेरिका व्यापार को लेकर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान, दबाव में सौदे से किया इनकार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत किसी भी देश के साथ व्यापार करेगा, लेकिन किसी प्रकार के दबाव या धमकी के आधार पर नहीं। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार जरूरी है, मगर राष्ट्रीय हितों से समझौता कर कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।

मोहन भागवत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर व्यापारिक नीतियां समय-समय पर बदलती रहती हैं। ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक ताकत और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों और प्राथमिकताओं के आधार पर दुनिया के साथ व्यापार करना चाहिए।

RSS प्रमुख ने यह भी कहा कि अगर किसी देश की ओर से टैरिफ या अन्य तरह के आर्थिक दबाव बनाए जाते हैं, तो उसके आगे झुकना भारत की नीति नहीं होनी चाहिए। भारत एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ऐसे में घरेलू उद्योग, किसान और छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

उन्होंने स्वदेशी सोच पर जोर देते हुए कहा कि देश की आंतरिक उत्पादन क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। जब भारत खुद मजबूत होगा, तभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में वह बराबरी की स्थिति में बात कर सकेगा। भागवत का मानना है कि किसी भी व्यापार समझौते से पहले यह देखना जरूरी है कि उससे देश के लोगों को वास्तविक लाभ हो रहा है या नहीं।

मोहन भागवत ने यह भी संकेत दिया कि भारत को केवल बड़े देशों की नीतियों के अनुसार चलने की जरूरत नहीं है। देश की अपनी परिस्थितियां, सामाजिक ढांचा और आर्थिक जरूरतें हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। व्यापार का उद्देश्य सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता होना चाहिए।

उनके इस बयान को भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और वैश्विक आर्थिक दबावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान भारत की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
RSS प्रमुख के बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि भारत भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर आत्मविश्वास के साथ फैसले लेगा और किसी भी तरह के दबाव में आकर अपनी आर्थिक नीतियों से समझौता नहीं करेगा।

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