तेल संकट और मिडिल ईस्ट तनाव पर संसद में हंगामा, सरकार पर उठे सवाल

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को लेकर संसद में शुरू हुई तीखी बहस

नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संभावित तेल संकट को लेकर राजनीतिक माहौल गरम हो गया। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर संसद में विस्तृत चर्चा की मांग की और कहा कि क्षेत्र में जारी संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ सकता है।

विपक्ष का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे हालात भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत अपनी बड़ी तेल जरूरतों को इसी क्षेत्र से पूरा करता है, इसलिए वहां की स्थिति का असर सीधे पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ सकता है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद में कहा कि सरकार को इस विषय पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए और यह बताना चाहिए कि देश को संभावित आर्थिक असर से बचाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। विपक्ष का यह भी कहना है कि विदेश नीति से जुड़े इतने अहम मुद्दे पर संसद को भरोसे में लेना जरूरी है।
सरकार की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। उन्होंने बताया कि भारत हमेशा शांति और बातचीत के जरिए समाधान का समर्थन करता है और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना सभी देशों के हित में है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है। जरूरत पड़ने पर उन्हें हर संभव सहायता देने की व्यवस्था की जाएगी।

इस दौरान कई विपक्षी नेताओं ने यह भी चिंता जताई कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। ऐसी स्थिति में भारत में भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्थिति की नियमित समीक्षा कर रहे हैं और संबंधित मंत्रालयों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का दावा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाएगा।
संसद के मौजूदा सत्र में इस मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल रही है। आने वाले दिनों में यह विषय संसद में और ज्यादा चर्चा का केंद्र बन सकता है।

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