ट्रंप का टैरिफ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में

राष्ट्रपति के टैरिफ लगाने के अधिकार पर होगा अंतिम फैसला

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति से जुड़ा सबसे बड़ा कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। बुधवार को ट्रंप प्रशासन ने देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दाखिल करते हुए अपील की कि अदालत जल्द से जल्द यह स्पष्ट करे कि राष्ट्रपति को संघीय कानून के तहत आयात पर बड़े पैमाने पर टैरिफ (Import Tariffs) लगाने का अधिकार है या नहीं।

दरअसल, ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान कई देशों से आयात होने वाले सामान पर भारी शुल्क लगा दिया था। उनका दावा था कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी है और इससे अमेरिका को विदेशी देशों के सामने मजबूती मिलेगी। लेकिन इन टैरिफों को अमेरिकी कंपनियों और उद्योगों ने अदालत में चुनौती दी।

हाल ही में फेडरल सर्किट अपील कोर्ट ने 7-4 के फ़ैसले से कहा कि ट्रंप द्वारा लगाए गए ज़्यादातर टैरिफ 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) का दुरुपयोग है और यह कांग्रेस की शक्ति छीनने जैसा है। अदालत ने टैरिफ को अस्थायी तौर पर जारी रहने दिया है, लेकिन मामले ने बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मोड़ ले लिया है।

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस फ़ैसले से विदेशी देशों के साथ जारी व्यापार वार्ताओं पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने पिछले पाँच महीनों में जिन सौदों और समझौतों के लिए टैरिफ को एक रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया है, वे सभी अब संकट में हैं।

दूसरी ओर, छोटे व्यवसायों और उद्योगों का कहना है कि ये टैरिफ उनके लिए नुकसानदेह हैं। लिबर्टी जस्टिस सेंटर के वरिष्ठ वकील जेफ़्री श्वाब का कहना है कि ये अवैध टैरिफ छोटे कारोबारियों की रीढ़ तोड़ रहे हैं और उनके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं। छोटे उद्योग इस मामले में पहले ही निचली अदालतों में जीत हासिल कर चुके हैं।

आर्थिक तौर पर देखें तो अगस्त 2025 तक अमेरिकी खजाने को टैरिफ से 159 अरब डॉलर की आमदनी हुई है, जो पिछले साल की तुलना में दोगुनी है। लेकिन इन फैसलों से वैश्विक बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ी, सहयोगी देशों के साथ रिश्ते कमजोर हुए और अमेरिका में महँगाई व धीमी वृद्धि का डर गहरा गया।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और आने वाले महीनों में तय होगा कि राष्ट्रपति को कितना अधिकार मिलना चाहिए। अगर कोर्ट ट्रंप के पक्ष में फैसला देता है, तो भविष्य में कोई भी राष्ट्रपति सीधे टैरिफ लगाकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदल सकता है। लेकिन अगर फैसला उनके खिलाफ जाता है, तो राष्ट्रपति को संसद से मंजूरी लेनी होगी। यह निर्णय न सिर्फ अमेरिका की आर्थ‌िक नीति बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगा।

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