हजारों अमेरिकियों की छंटनी, ट्रंप ने वीजा फीस बढ़ाने की बताई 9 वजहें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा की फीस 1 लाख डॉलर करने का ऐलान किया। व्हाइट हाउस ने इसे अमेरिकी नौकरियों और सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी बताया। कंपनियों पर छंटनी और विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने के गंभीर आरोप लगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा की फीस को 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) करने का ऐलान कर दिया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह फैसला देश की नौकरियों और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी है। सरकार ने शुक्रवार को एक आधिकारिक पत्र जारी कर इस फैसले के पीछे 9 बड़े कारण गिनाए।

कंपनियों पर गंभीर आरोप

व्हाइट हाउस के अनुसार, कई बड़ी कंपनियां H-1B प्रोग्राम का दुरुपयोग कर रही हैं। एक कंपनी ने जहां 5,189 H-1B वीजा हासिल किए, वहीं उसी अवधि में उसने 16,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। दूसरी कंपनियों पर भी इसी तरह के आरोप लगाए गए, जिनमें ओरेगन स्थित एक फर्म ने 2,400 नौकरियां खत्म कर 1,698 H-1B वीजा लिए।

9 कारण जो गिनाए गए

  1. आईटी सेक्टर में बढ़ता विदेशी निर्भरता – 2003 में H-1B कर्मचारियों की हिस्सेदारी 32% थी, जो 2025 तक 65% से ऊपर पहुंच जाएगी।
  2. अमेरिकी ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी – कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में बेरोजगारी दर 6 से 7.5% है, जो अन्य विषयों से कहीं अधिक है।
  3. विदेशी बनाम घरेलू रोजगार – 2000 से 2019 तक विदेशी STEM कर्मचारियों की संख्या दोगुनी हो गई, जबकि कुल STEM नौकरियों में वृद्धि सिर्फ 44% रही।
  4. कंपनियों की छंटनी – अमेरिकी वर्कफोर्स घटाते हुए लगातार H-1B स्वीकृतियां ली जाती रहीं।
  5. कर्मचारियों पर दबाव – अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों को मजबूर किया गया कि वे अपने रिप्लेसमेंट विदेशी कर्मचारियों को ट्रेन करें।
  6. घरेलू वर्कफोर्स के लिए खतरा – इस प्रोग्राम ने अमेरिकी युवाओं को टेक सेक्टर में आने से हतोत्साहित किया।
  7. राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता – अहम सेक्टर्स में विदेशी श्रम पर निर्भरता को खतरनाक बताया गया।
  8. नए सुधार – श्रम विभाग को वेतन नियम बदलने और हाई स्किल्ड नौकरियों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए।
  9. अमेरिका फर्स्ट’ नीति – प्रशासन का दावा है कि यह कदम अमेरिकी नागरिकों की नौकरी सुरक्षित करेगा।

क्या होगा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी ऊंची फीस छोटे और मंझोले स्तर की कंपनियों के लिए चुनौती बन जाएगी। वहीं भारतीय आईटी सेक्टर पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि H-1B वीजा धारकों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय पेशेवरों की है।

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