सौरभ पांडे ने बनाई दूरी, अब अरुण भारती की है असली परीक्षा

“2020 में चिराग पासवान की रणनीति के पीछे सौरभ पांडे थे, लेकिन 2025 में अरुण भारती सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एलजेपी के लिए यह चुनाव उनकी रणनीतिक क्षमता की असली परीक्षा होगा।”

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में जब चिराग पासवान ने अकेले चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लिया था, तो उसके पीछे सौरभ पांडे की रणनीति मानी गई थी। उन्होंने न केवल इस फैसले को आकार दिया, बल्कि बिहार भर में चिराग के समर्थन में कई प्रभावशाली नेताओं को एकजुट भी किया था। उस चुनाव ने नीतीश कुमार के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।

लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में सौरभ पांडे खुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखते नजर आ रहे हैं। इस बार न तो वे गठबंधन की रणनीति में दिखे, न ही उम्मीदवारों के टिकट वितरण में उनकी कोई भूमिका दिखाई दी। इसके उलट, पार्टी में अब अरुण भारती सक्रिय भूमिका में हैं। उन्होंने 29 सीटों की जिम्मेदारी ली और सभी उम्मीदवारों को टिकट भी दिए हैं।

राजनीति में आने से पहले अरुण भारती पटना में टाटा कमर्शियल वाहनों के शोरूम के साथ ऑटोमोबाइल बिजनेस चला रहे थे। कारोबार में नुकसान होने के बाद उन्होंने यह व्यवसाय बंद कर दिया और 2020 में राम विलास पासवान के निधन के बाद राजनीति में कदम रखा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2020 में सौरभ पांडे द्वारा बनाई गई रणनीति का लाभ चिराग पासवान को बाद में लोकसभा चुनाव में मिला। अब वही जिम्मेदारी अरुण भारती के कंधों पर है, और 2025 का चुनाव उनके काम की असली परीक्षा साबित होगा।

सौरभ पांडे की आखिरी बड़ी राजनीतिक भूमिका 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान देखी गई थी। उस समय उन्होंने वैकल्पिक गठबंधन का सुझाव दिया था, जिसकी चर्चा मीडिया में आने के बाद बीजेपी ने तत्काल चिराग पासवान को 5 सीटें सौंप दीं। माना गया कि 2020 की रणनीति से एलजेपी का जनाधार मजबूत हुआ था और उसका असर नतीजों में साफ दिखा।

सूत्रों के अनुसार, सौरभ पांडे और चिराग पासवान के निजी रिश्ते अब भी अच्छे हैं, लेकिन दोनों अब राजनीतिक विचार साझा नहीं करते। सौरभ पांडे का राजनीतिक और संगठनात्मक अनुभव काफी गहरा है। फिलहाल वे होटल और कंस्ट्रक्शन के कारोबार में सक्रिय हैं।

“बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” का विजन डॉक्यूमेंट सौरभ पांडे की ही सोच का परिणाम था। इसी नारे के दम पर उन्होंने 2020 में एलजेपी को एक नए स्वरूप में स्थापित किया था। अकेले चुनाव लड़ने का फैसला उनके कठोर लेकिन दूरदर्शी निर्णयों में गिना गया, जिसने चिराग पासवान को लोकप्रिय बनाया और कई मजबूत चेहरों को पार्टी से जोड़ा। आज भी एलजेपी इसी विजन डॉक्यूमेंट को अपनी पहचान के रूप में इस्तेमाल करती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह आज प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति को एक नए मॉडल में ढाल रहे हैं, कुछ वैसा ही काम 2020 में सौरभ पांडे ने किया था। उनके उस कदम का नतीजा यह रहा कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 38 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था।

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