क्या बदलने वाला है टेक्नोलॉजी का पावर गेम? मैक्रों का साफ संदेश

तकनीकी आत्मनिर्भरता, डेटा सेंटर और टैलेंट निर्माण पर भारत-फ्रांस की समान सोच

फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस की सोच कई मामलों में एक जैसी है और दोनों देश पूरी तरह अमेरिकी या चीनी मॉडल पर निर्भर रहने के पक्ष में नहीं हैं।

मैक्रों ने स्पष्ट किया कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में ऐसे मॉडल की जरूरत है जो संतुलित हो और जिसमें विभिन्न देश सक्रिय भागीदारी निभा सकें। उनका कहना था कि केवल दो महाशक्तियों पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। भारत, फ्रांस और यूरोप जैसे देशों को अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित करनी होगी ताकि वे वैश्विक तकनीकी ढांचे में प्रभावी भूमिका निभा सकें।

उन्होंने विशेष रूप से डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और घरेलू स्तर पर प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल तकनीक खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगी कि किस देश के पास मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित मानव संसाधन और पर्याप्त पूंजी उपलब्ध है।

राष्ट्रपति मैक्रों ने यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान समय में अमेरिका और चीन तकनीकी क्षेत्र में आगे हैं। फिर भी उन्होंने भरोसा जताया कि भारत और फ्रांस इस दौड़ में शामिल हैं और अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहे हैं

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक स्पष्ट संकेत है। भारत और फ्रांस पहले ही रक्षा, अंतरिक्ष और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ा चुके हैं। अब उभरती तकनीकों, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के क्षेत्र में साझेदारी को नई गति मिलने की संभावना है।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दुनिया में तकनीकी वर्चस्व को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। ऐसे में भारत और फ्रांस का स्वतंत्र और बहु-आयामी मॉडल की बात करना वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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