PM मोदी के इजरायल दौरे पर सियासी विवाद, संसद संबोधन के बहिष्कार की चेतावनी

इज़राइल की संसद में संभावित संबोधन से पहले विपक्ष ने न्यायपालिका मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया, बहिष्कार की अटकलें तेज।

भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi का आगामी इज़राइल दौरा वहां की आंतरिक राजनीति के कारण चर्चा में आ गया है। जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी अपनी यात्रा के दौरान इज़राइल की संसद Knesset को संबोधित कर सकते हैं। यह दौरा भारत और इज़राइल के मजबूत होते रिश्तों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन विपक्षी राजनीति ने इसे विवाद का रूप दे दिया है।

इज़राइल में विपक्ष के प्रमुख नेता Yair Lapid ने संकेत दिया है कि अगर संसद के विशेष सत्र में सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को औपचारिक रूप से आमंत्रित नहीं किया गया, तो वह और उनकी पार्टी प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन का बहिष्कार कर सकते हैं। लैपिड का कहना है कि न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को न बुलाना परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा।

दरअसल, इज़राइल में न्यायपालिका और सरकार के बीच पिछले कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश की भूमिका को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का संभावित संबोधन इस बहस के बीच हो रहा है, जिससे मामला और संवेदनशील बन गया है।

विपक्ष का तर्क है कि अगर संसद का आधा हिस्सा खाली रहेगा तो यह न केवल इज़राइल की छवि पर असर डालेगा, बल्कि भारत जैसे करीबी मित्र देश के प्रति भी गलत संदेश जाएगा। वहीं संसद अध्यक्ष की ओर से यह कहा गया है कि भारत-इज़राइल संबंध किसी एक राजनीतिक दल से ऊपर हैं और इन्हें घरेलू राजनीति का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और इज़राइल के संबंध रक्षा, तकनीक, कृषि और व्यापार जैसे क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में यह दौरा रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। हालांकि, विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच जारी बयानबाजी ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया है।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या विपक्ष अपने बहिष्कार के फैसले पर कायम रहता है या फिर दोनों पक्ष किसी सहमति पर पहुंचते हैं। साफ है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा सिर्फ कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इज़राइल की आंतरिक राजनीति के लिए भी एक अहम परीक्षा बन गया है।

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