नवरात्रि पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा-विधि व महत्व

माँ शैलपुत्री की पूजा विधि, पसंदीदा फूल और महत्व जानें

नवरात्रि का पहला दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा को समर्पित होता है। शैलपुत्री का अर्थ है – पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वे भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं और वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल शोभित होता है। देवी शैलपुत्री साधना का प्रथम चरण मानी जाती हैं।

पूजा की विधि

प्रथम दिन सुबह स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को पवित्र कर घटस्थापना की जाती है। कलश में गंगाजल या स्वच्छ जल भरें, उसमें आम या अशोक के पत्ते रखें और ऊपर नारियल स्थापित करें। यह कलश देवी का प्रतीक माना जाता है।

इसके बाद माँ शैलपुत्री का आवाहन कर उन्हें रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। विशेष रूप से इस दिन गुड़हल, सफेद कनेर या चमेली के फूल चढ़ाना अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि ये फूल देवी शैलपुत्री को प्रिय हैं। माना जाता है कि इन फूलों से पूजा करने पर साधक को शांति, साहस और स्थिरता की प्राप्ति होती है।

भोग में घी अर्पित करने का विधान है। यह माना जाता है कि इससे भक्त को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। पूजा के समय दीपक जलाना और आरती करना आवश्यक है।

महत्व और कथा

कथा के अनुसार, पिछले जन्म में वे सती थीं और अपने पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान सहन न कर स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया था। पुनर्जन्म में वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री बनीं और शैलपुत्री कहलाईं। इसीलिए उनकी साधना से आत्म-सम्मान, साहस और भक्ति का संचार होता है।

मंत्र

माँ शैलपुत्री की पूजा के दौरान यह मंत्र जप करना शुभ होता है –

“वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥”

नवरात्रि का पहला दिन साधना और शक्ति की शुरुआत का प्रतीक है। माँ शैलपुत्री को गुड़हल, सफेद कनेर या चमेली के फूल चढ़ाकर, घी का भोग लगाकर और मंत्र जाप करके उपासना करने से भक्त के जीवन में शांति, साहस और स्थिरता का संचार होता है।

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